पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल ने समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक के प्रारूप को स्वीकृति प्रदान कर दी है।
विधेयक की प्रमुख विशेषताएँ
- उद्देश्य: यह विधेयक सभी समुदायों में बहुविवाह तथा एक साथ एकाधिक विवाहों पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान करता है।
- इसमें बहुविवाह एवं निकाह हलाला जैसी प्रथाओं पर रोक लगाने के साथ-साथ लिव-इन संबंधों के संबंध में कठोर प्रावधान किए गए हैं।
- छूट : यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 एवं अनुच्छेद 366 के अंतर्गत अधिसूचित अनुसूचित जनजातियों (जैसे- भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया तथा भरिया) पर लागू नहीं होगा।
- इसके अतिरिक्त, संविधान के भाग XXI के अंतर्गत जिन समुदायों के पारंपरिक अधिकार संरक्षित हैं, उन्हें भी इस कानून से विशेष रूप से छूट प्रदान की गई है।
- पंजीकरण : सभी समुदायों के लिए विवाह एवं तलाक का सरकारी पोर्टल के माध्यम से पंजीकरण अनिवार्य होगा।
- वैध संतान का दर्जा: इस संहिता में विधिक व्यवस्था से ‘अवैध संतान’ शब्द को समाप्त कर दिया गया है।
- विवाहित अथवा अविवाहित माता-पिता से जन्मे बच्चे, चाहे वे जैविक हों, गोद लिए गए हों अथवा सरोगेसी या सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (ART) के माध्यम से जन्मे हों, सभी को समान विधिक दर्जा प्राप्त होगा।
- लिव-इन संबंध : लिव-इन संबंध में रहने वाले युगल को संबंध प्रारंभ होने के एक माह के भीतर स्थानीय पंजीयक के समक्ष शपथ-पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। ऐसा न करने पर विधिक कार्रवाई की जा सकेगी।
- लिव-इन संबंध में प्रवेश की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होगी। यदि किसी भी पक्ष की आयु 21 वर्ष से कम है, तो संबंध के प्रारंभ एवं समाप्ति की सूचना उसके माता-पिता अथवा अभिभावकों को दी जाएगी तथा इसका अभिलेख स्थानीय पुलिस के साथ भी साझा किया जाएगा।
- लिव-इन संबंध से जन्मे बच्चों को वैध संतान माना जाएगा तथा उन्हें उत्तराधिकार के पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगे।
समान नागरिक संहिता (UCC)
- परिभाषा: समान नागरिक संहिता ऐसे समान कानूनों का समूह है, जो धर्म की परवाह किए बिना सभी नागरिकों के विवाह, तलाक, दत्तक ग्रहण, उत्तराधिकार एवं संपत्ति के उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करता है।
- अनुच्छेद 44: समान नागरिक संहिता का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 44 में किया गया है।
- यह अनुच्छेद राज्य को निर्देश देता है कि वह भारत के समस्त नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।
क्या आप जानते हैं?
- स्वतंत्रता के पश्चात गोवा ने गोवा सिविल कोड को बनाए रखा, जिसके कारण वर्ष 2024 तक वह भारत का एकमात्र राज्य था जहाँ समान नागरिक संहिता लागू थी।
- वर्ष 2024 में उत्तराखंड विधान सभा ने उत्तराखंड समान नागरिक संहिता अधिनियम, 2024 पारित किया, जिससे वह स्वतंत्रता के बाद UCC लागू करने वाला प्रथम भारतीय राज्य बना।
- वर्ष 2026 में गुजरात एवं असम ने भी अपने-अपने राज्यों में समान नागरिक संहिता संबंधी विधेयक पारित किए।
अनुच्छेद 44 की पृष्ठभूमि
- संविधान निर्माण के दौरान डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि समान नागरिक संहिता वांछनीय है, किंतु तत्काल इसे स्वैच्छिक रखा जाना चाहिए।
- इसी उद्देश्य से प्रारूप संविधान के अनुच्छेद 35 को बाद में राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 44 के रूप में सम्मिलित किया गया।
- इसे संविधान में इस आशय से शामिल किया गया कि जब राष्ट्र इसके लिए सामाजिक रूप से तैयार होगा तथा व्यापक सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होगी, तब इसे लागू किया जाएगा।
समान नागरिक संहिता के पक्ष में तर्क
- शासन व्यवस्था में एकरूपता: समान कानून होने से प्रशासनिक प्रक्रियाएँ सरल होंगी तथा न्याय वितरण अधिक प्रभावी एवं सुव्यवस्थित होगा।
- महिलाओं के अधिकार: विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं के विरुद्ध भेदभावपूर्ण प्रावधान पाए जाते हैं। समान नागरिक संहिता अधिक समानतापूर्ण एवं न्यायसंगत विधिक ढाँचा प्रदान करेगी।
- धर्मनिरपेक्षता: समान नागरिक संहिता सभी नागरिकों के साथ उनके धर्म से परे समान व्यवहार सुनिश्चित कर भारत की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को सुदृढ़ करेगी।
- सर्वोच्च न्यायालय ने मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम (1985) सहित अनेक निर्णयों में UCC लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया है।
- राष्ट्रीय एकता की भावना: UCC विविध समुदायों के लिए समान विधिक आधार स्थापित कर राष्ट्रीय एकीकरण को प्रोत्साहित करेगा।
- आधुनिकीकरण: यह समकालीन मानवाधिकारों, समानता एवं न्याय की अवधारणाओं के अनुरूप विधिक व्यवस्था विकसित करने में सहायक होगा।
समान नागरिक संहिता के विरोध में तर्क
- वर्तमान विधिक बहुलता: विशेषज्ञों का मत है कि जब वर्तमान दीवानी एवं दंड कानूनों में भी विविधता विद्यमान है, तब “एक राष्ट्र, एक कानून” की अवधारणा को विभिन्न समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों पर लागू करना कठिन है।
- कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ: भारत की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विविधता के कारण विभिन्न समुदाय अपने-अपने व्यक्तिगत कानूनों का पालन करते हैं, जिससे UCC का कार्यान्वयन जटिल हो जाता है।
- संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत होने की आशंका: इसे संविधान के अनुच्छेद 25, अनुच्छेद 26 तथा छठी अनुसूची द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता एवं सांस्कृतिक अधिकारों के संभावित अतिक्रमण के रूप में देखा जाता है।
- विधि आयोग का दृष्टिकोण: भारत के विधि आयोग ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में UCC “न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय”।
- आयोग ने सुझाव दिया कि प्रत्येक धर्म के व्यक्तिगत कानूनों में विद्यमान भेदभावपूर्ण प्रथाओं एवं रूढ़ियों का अध्ययन कर उनमें सुधार किया जाए।
- सर्वसम्मति का अभाव: विभिन्न धार्मिक मान्यताओं एवं परंपराओं के कारण ऐसा एकल कानून तैयार करना कठिन है जिसे सभी समुदाय स्वीकार करें। इससे सामाजिक असंतोष उत्पन्न हो सकता है।
- क्रमिक सुधार की आवश्यकता: आलोचकों का मत है कि व्यक्तिगत कानूनों में समुदायों की सहमति से चरणबद्ध सुधार करना, एक समान संहिता लागू करने की अपेक्षा अधिक प्रभावी होगा।
विभिन्न समितियों की अनुशंसाएँ
- बी. एन. राऊ समिति (1947): समिति ने समान नागरिक संहिता की अनुशंसा की, किंतु इसके कार्यान्वयन को तब तक स्थगित रखने का सुझाव दिया जब तक देश में पर्याप्त एकता एवं सामाजिक सहमति विकसित न हो जाए।
- सच्चर समिति (1986): समिति ने समान नागरिक संहिता के महत्व को स्वीकार करते हुए कहा कि यह समानता एवं सामाजिक न्याय को प्रोत्साहित करेगी।
- तथापि, सामाजिक तैयारी के अभाव में इसके तत्काल कार्यान्वयन का समर्थन नहीं किया।
- विधि आयोग की रिपोर्टें (1986 एवं 2018):
- 1986 की रिपोर्ट: धार्मिक विविधता को ध्यान में रखते हुए UCC को सावधानीपूर्वक एवं चरणबद्ध ढंग से लागू करने की अनुशंसा की गई।
- व्यक्तिगत कानूनों में आवश्यक सुधारों को प्राथमिकता देने पर बल दिया गया।
- 2018 की रिपोर्ट: UCC को तभी लागू करने की अनुशंसा की गई जब व्यापक सामाजिक सहमति विकसित हो जाए।
- आयोग ने व्यक्तिगत कानूनों में सुधार कर उन्हें आधुनिक मूल्यों एवं मानवाधिकारों के अनुरूप बनाने का सुझाव दिया।
- 1986 की रिपोर्ट: धार्मिक विविधता को ध्यान में रखते हुए UCC को सावधानीपूर्वक एवं चरणबद्ध ढंग से लागू करने की अनुशंसा की गई।
व्यक्तिगत कानूनों से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय
- शाह बानो मामला (1985): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि मुस्लिम महिलाओं को उनके व्यक्तिगत कानूनों से परे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार है।
- इस निर्णय ने लैंगिक समानता के महत्व को रेखांकित किया।
- सरला मुद्गल मामला (1995): सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से विवाह एवं तलाक संबंधी कानूनों में एकरूपता लाने हेतु समान नागरिक संहिता लागू करने पर विचार करने का आग्रह किया।
- तीन तलाक निर्णय (2017): सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तत्काल तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त कर दिया।
- यह निर्णय व्यक्तिगत कानूनों में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया।
- इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य (2018) (सबरीमला मामला): यद्यपि यह मामला प्रत्यक्ष रूप से UCC से संबंधित नहीं था, तथापि इसने धार्मिक प्रथाओं में लैंगिक समानता के प्रश्न को प्रमुखता से उठाया।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत कानूनों अथवा धार्मिक प्रथाओं के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव स्वीकार्य नहीं है।
आगे की राह
- भारत में समान नागरिक संहिता का प्रभावी कार्यान्वयन संतुलित, समावेशी एवं चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाने पर निर्भर करेगा। इसके लिए आवश्यक है कि लैंगिक न्याय, संवैधानिक मूल्यों, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विविधता तथा विभिन्न समुदायों की संवेदनशीलताओं के मध्य संतुलन स्थापित किया जाए। साथ ही, व्यापक सामाजिक संवाद एवं सहमति के माध्यम से व्यक्तिगत कानूनों में क्रमिक सुधार करते हुए समान नागरिक संहिता की दिशा में आगे बढ़ना अधिक व्यावहारिक एवं स्वीकार्य मार्ग होगा।
स्रोत: TH
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